राजू ठाकुर/निलेश धनकर✍…
नगर का प्रवेश द्वार इन दिनों अवैध कब्जाधारियों के लिए मानो खुला खेल बन चुका है। जिस सड़क से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, वहीं पर कब्जाधारियों का इतना आतंक है कि प्रशासन खुद बेकाबू ट्रैफिक की तरह रास्ता खोजता फिर रहा है लेकिन कार्रवाई शून्य।

सुबह 9 बजे से ऐसा भीषण जाम लगता है कि स्कूली बच्चों, मरीजों और ऑफिस जाने वालों का हाल बेहाल हो जाता है। अतिक्रमण के कारण छोटे-छोटे हादसे आम बात हो गई है, पर प्रशासन की नींद अब तक नहीं खुली।
सवाल उठता है—क्या प्रशासन वाकई अंधा-बहरा हो चुका है, या किसी के इशारे पर सबकुछ देख भी अनदेखा कर रहा है?

सबसे हैरानी की बात यह है कि इस अतिक्रमण की जड़ में कुछ जनप्रतिनिधि खुद शामिल हैं। उनके ठेले खुलेआम कब्जे वाली जमीन पर खड़े हैं, और उन्हें बाकायदा किराए पर चलाया जा रहा है। यानी अवैध कब्जे सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि कमाई का धंधा बन चुके हैं वह भी नेताओं की खुली शह में अगर जनप्रतिनिधि ही कब्जाधारी बन जाएं, तो फिर आम लोगों से क्या उम्मीद?

नगरवासियों का धैर्य टूट रहा है। अब देखना यह है कि
क्या प्रशासन साहस दिखाकर इस ‘राजनीतिक कब्जा साम्राज्य’ पर बुलडोजर चलाएगा या फिर सत्ता के दबाव में घुटनों पर बैठकर अपनी ही जिम्मेदारी का अंतिम संस्कार कर देगा फिलहाल हालात बता रहे हैं कि नगर नहीं, बल्कि कब्जाधारी और उनके संरक्षक शासन कर रहे हैं।
